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Wednesday, October 15, 2014

9:42:00 AM

हम सफल कैसे हो



हम सभी चाहते है सफल होना, हममे से कोई ये नहीं चाहेगा कि असफल हो कर घर पे बैठ जाये !
तो फिर सफल होने के लिए क्या नहीं होना चाहिए- मै असफल लोगो को देखा हु उनके अंदर बहुत ही एक Popular Disease पायी जाती है जिसे हम बहानासाइटिस कह सकते है Mins हर वक्त बहाना बनाना !
यह Post इसी Disease पे है !!!!

   चुकि सफलता का संबंध लोगो से है, इसलिए सफल होने के लिए यह जरुरी है कि आप लोगो को अच्छी तरह समझ ले ! अगर आप लोगो का अध्ययन Fathom से करे और जब आप ऐसा करेगे तो आप देखेगे कि असफल लोगो को दिमाग की एक भयानक Disease होती है! हम इस Disease को बहानासाइटिस का नाम दे सकते है ! हर असफल ब्यक्ति में यह Disease बहुत ही ज्यादा देखने को मिलता है और ज्यादातर आम आदमियो में यह होता ही है !
    आप पाएंगे कि बहानासाइटिस की Disease सफल और असफल व्यक्ति के बीच का सबसे बड़ा अंतर होता है ! सफलता कि सीढ़ियों पर बिना रुके चढ़ने वाला व्यक्ति बहानासाइटिस का रोगी नहीं होता, जबकि असफलता कि ढलान पर लगातार फिसलने वाला व्यक्ति बहानासाइटिस से गम्भीर रूप से पीड़ित होता है!
     सफल लोगो की जिंदगी का अध्ययन करे और उन सबमें एक बात पाएंगे कि असफल लोग जो बहाने बनाते है, सफल व्यक्ति भी वही बहाने बना सकते है! असफल लोगो के पास बहाने थोक में होते है लेकिन सफल लोग कभी बहाने नहीं बनाते, तभी तो आज वो सफल व्यक्तियो में गिने जाते है !
     मै जितने भी बेहद सफल Business, Salesman, Professional व्यक्तियो या किसी भी क्षेत्र में आगे रहने वाले लोगो के बारे में पढ़ा या सुना है उनके पास बहानो कि कोई कमी नहीं थी -
Dr. A.P.J. Abdul Kalam - जो बेहद गरीब परिवार से थे पर ये महान Scientist बने और बाद में भारत के राष्ट्रपति भी बने ! यह अपने गरीबी का बहाना बना सकते थे!
Roosevelt अपने बेजान पैरो का बहाना बना सकते थे!
     किसी भी Disease कि तरह बहानासाइटिस का अगर वक्त पर सही इलाज नहीं किया जाए तो हालत बिगड़ सकती है !
     बुरी सेहत ? शिक्षा का अभाव ? बदकिस्मती ? एैसे कुछ बहाने है जो अक्सर लोग करते है !
असफलता कि Disease से पीड़ित व्यक्ति जब किसी अच्छे बहाने को चुन लेता है, तो फिर वह इसे कसकर जकड लेता है और फिर लोगो को और खुद को यह समझता है कि वह जीवन में आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा है और हर बार जब यह बीमार व्यक्ति बहाना बनाता है, तो वह बहाना उसके  Subconscious में और उसके गहराई में चला जाता है ! जब हम उनमे दोहराव कि खाद डालते है तो  Thought, चाहे  Positive हो या Negative, ज्यादा तेजी से फलने फूलने लगते है! Starting में तो बहाना बनाने वाला जानता है कि उसका बहाना झूठ है पर वह जीतनी ज्यादा बार अपने बहाने को दोहराता है, उतना ही उसे लगने लगता है कि यही सच है और यही उसकी असफलता का असली कारण है !
                                                      सफलता की राह में अपने  Meditation को सही दिशा में ले जाने के लिए सबसे पहले तो आपको यह कदम उठाना पड़ेगा कि आप बहानासाइटिस से बचाव के लिए वैक्सीन लगवा ले, यह इस लिए जरुरी है, क्योकि बहानासाइटिस एक ऐसी Disease है, जो इंसान को जिंदगी भर सफल नहीं होने देती !!!

Sunday, August 17, 2014

7:19:00 AM

कृष्ण जन्माष्टमी कविता



हे कृष्णा मेरे सभी मित्रों पर अपनी कृपा बनाए रखना, सबका भला सबका कल्याण करना, वृंदावन का कृष्ण कनहैया ,सबकी आँखों का तारा , मन ही मन क्यों जले राधिका ,मोहन तो है सब का प्यारा | जमुना तट पर नंद का लाला,जब जब रास रचाए रे, तन मन डोले कानहा ऐसी, वंशी मधुर बजाए रे, सुध बुध खोए खड़ी गोपियाँ ,जाने कैसा जादू डारा ||१|| 
रंग सलोना ऐसा जैसे,छाई बदरिया सावन की, मैं तो हुई दिवानी,सावन के मन भावन की, रे कारण देख बाबरे,छोड़ दिया मैंने जग सारा ||२|| ''जय श्री राधे कृष्णा ' जय श्री कृष्णा जय जय श्री कृष्णा
/////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////
कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये //


Saturday, August 16, 2014

5:02:00 AM

आशकी के चुटकुले

Ladki apne boyfriend ko naraz krne k baad sms pe kaise manati he
1st hour : sorry
2nd hour : soory plz 
3rd hour: plz bas ek bar baat kro 
4th hour: plz rly me jaan 
5th hour: plz etna naraz mat ho
6th hour: i am sorry i will die agr tumne baat nahi ki
7 hour:dafa hoja kutte 100 ldke ghumte h tere jaise, thoda bhav kya diya khud ko hero smjhne laga jahannum me ja....
boy: sorry dear blance nahi tha...
grl: oooh..its ok I LOVE YOU jaan....... 

और भी चुटकुले पढने के लिए  link पे  click करे 
4:42:00 AM

सायरी


निकले जब आंसू उसकी आँखों से,
मन करता है सारी दुनिया जला दू ,
फिर सोचता हु होगे दुनिया में उसके भी अपने,
कही अनजाने में उसे और ना रुला दू !!!!!!

Sunday, July 20, 2014

12:02:00 AM

आज तेरे प्यार की कहानी लिखता हूँ



बातें कुछ भूली बिसरी पुरानी लिखता हूँ ,
आज तेरे प्यार की कहानी लिखता हूँ।

तुझे सोचता हूँ तो साँसे महकती हैं मेरी
दिल के खुदा को दिल क़ि जुबानी लिखता हूँ,

हम तुम इतने जुदा एक होते भी कैसे;
खुद को दीवाना तुझको सयानी लिखता हूँ

तेरी जुल्फों क़ि छाँव में कटती ऐ काश जिन्दगी,
कुछ हसरते गुमनाम कुछ
जानी पहचानी लिखता हूँ,

अपने अधिकार से परे भी तेरे बारे में सोचा है
कई बार,
ईमान से आज दिल क़ि सारी बेईमानी लिखता हूँ
आज तेरे प्यार क़ि कहानी लिखता हूँ..

Saturday, July 5, 2014

6:17:00 AM

Mindless Quiz



(A) जिसका   दिल टुटा हो , उसे  "GENERAL KNOWLEDGE" की            जरुरत क्यों नहीं होती ..??
      सोचो ...!
      सोचो ... जल्दी बताओ क्यों ?
Ans- Click me


5:37:00 AM

मै तो हु मुसाफिर



मुसाफिर हूँ चलता चला जा रहा हु ! 
रास्ते कई है सफर में फिर भी, 
मंजिल की तरफ बढ़ता चला जा रहा हु, 
मिल रहे है तरह - तरह के लोग, 
कोई साथ चल कर खुश है, 
तो कोई दुरी बना कर खुश है !!!

मै तो हु मुसाफिर ..........  
मन्ज़िल क़ी तऱफ बढते चला ज रहा हु  !!!

जान  लो समझ लो मेरे दोस्त !
आज ही तय कर लो  मंजिल अपने, 
तेजी से चल रहा है समय का पहिया, 
दौड़ पड़ो कूद पड़ों इस मैदाने जंग में, 
आज ही तय कर लो  मंजिल अपने, 
कही ऐसा न हो की पछताना पड़े, 
चारो ओर गाली सुनते जाना पड़े, 
तो आज ही तय कर लो  मंजिल अपने,
क्योकि तेजी से चल रहा है समय का पहिया !!! 

मै  तो हु मुसाफिर ..........  
मन्ज़िल क़ी तऱफ बढते चला ज रहा हु  !!!

 ҉  आशिकी कविताएँ ҉                               ҉  Love Sayari ҉
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Thursday, July 3, 2014

6:31:00 AM

सायरी



दिल दे दिया है तुझे
अब दिल लगी न होगी किसी और से
तुम प्यार करो या न करो
मै तो करुगा प्यार तुम्ही से

 ҉  आशिकी कविताएँ ҉                               ҉  Love Sayari ҉

Wednesday, June 18, 2014

1:08:00 AM

मै तो उससे प्यार करता हु दिवानो कि तरह




तू थाम लिया मुझे उस चौराहे पे
जहा मै घायल पड़ा था 
जो साथ चल रहा था मेरे
न जाने कब रास्ता बदल लिया

मै तो प्यार करता था उसे दिवानो कि तरह
पर वो इतनी खामोशी से रास्ता बदल लिया
शायद जो मै मशीन कहा करता था अपने आप को
हो सकता है उसने मुझे मशीन ही समझ लिया होगा
तभी तो,दिया नहीं मौका अपनी बेगुनाही साबित करने को
या फिर डरती थी प्यार में जीने को
कोशिश की मैंने बहुत उसको साथ ले चलने को
पर जो रास्ता पहुचता था उसके घर को 
ना जाने वो हर रस्ते क्यों बंद कर दिया 
पर वो भी जानती है कितना प्यार करता हु
अब तो एक जिद्द सी हो गयी है उसे पाने को
अगर वो रास्ता बंद करना जानती है 
तो मै खुद रास्ता बनाना जानता हु 
क्योंकि मै तो उससे प्यार करता हु दिवानो कि तरह..
क्योंकि मै तो उससे प्यार करता हु दिवानो कि तरह 

 ҉  आशिकी कविताएँ ҉                               ҉  कितना खुदगर्ज हो गया है ये इंसान ҉



Tuesday, June 17, 2014

3:51:00 AM

मेरे सैनिक विजय गीत गाते चल



मेरे सैनिक विजय गीत गाते चल  !
कारवा हो ऐसी जो हमेशा कदम बढ़ते चल !! 
चल साथ तू साथ कदम बढ़ाते चल !
मेरे सैनिल विजय गीत गाते चल !!

तेरे पैरो की थाप हो इस तरह ! 
दुश्मन के काप जाये मनोबल !!
तू चढ़ता चला जा तू बढ़ता चला जा !
हो विजय तुम्हारी हर - पल !!

वो मेरे सैनिक विजय गीत गाते चला चल !!!!

ना सोच पाये कोई भिड़ने को 
ना आँख दिखा पाये तुमको 
इस तरह विजय गीत गाता चल 
साथ - साथ कदम से कदम मिलाता चल 

रहे हैरान सारे दुश्मन 
हो जाये परेशान दुश्मन 
इस तरह विजय गीत गाता चल 
कदम से कदम मिलाता चल 

वो मेरे सैनिक विजय गीत गाते चला चल !!!!

                                       ҉  देशभक्ति कविताएँ ҉                               ҉  वतन की एक आवाज ҉







Friday, May 16, 2014

9:01:00 PM

अबकी बार मोदी सरकार


अगर आप अबकी बार मोदी सरकार सुन सुन के पक चुके हैं तो सुनिए कुछ नया....

"सुरक्षित काले मेरे बाल, पागल हो गया केजरीवाल."

"च्यवनप्राश हो सोना चाँदी, नही जीतेगा राहुल गाँधी."

"अब तो कांग्रेस के भी अच्छे दिन आने वाले है, दिग्विजय सिंह भाभी लाने वाले है." 
उपर छतरी निचे छाया
भाग राहुल मोदी आया 

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Thursday, May 15, 2014

4:21:00 AM

सायरी



जो तू रूठ कर चली गयी है
तो और ज्यादा एहसास हो रहा है तेरे प्यार का
मै नहीं जनता था प्यार करती है तू इतना
बस तेरे प्यार करने का अंदाज अलग था

 «« More Shayari  »» 

Friday, May 2, 2014

5:13:00 AM

भरी महफ़िल में



भरी महफ़िल में ना इस कदर मुझे देखा करो
ये सारे नजारे बैठे लोग  देखा करते है
मै तो समझ नहीं पाता तेरे इशारे को
पर महफ़िल में बैठे लोग सब समझा करते है

ये तेरी गुस्ताख निगाहे
जब भी मेरे आँखो से मिलती है
सुलझाती कुछ नहीं, और भी उलझा देती है
ना  जाने तू देखती है प्यार से,
या तेरे देखने का तरीका ही यही है
इतना समझने कि कोशिश किया
पर न जाने क्यों समझ में ना आती है
जब जब तू देखा करती है
हर बार दिल में एक सवाल उमड़ आती है
कि तू देखती है प्यार से,
या तेरे देखने का तरीका ही यही है

अगर नहीं समझ पाता,इशारो कि भाषा
तो क्यों ना बोल के ही समझा देती है
कही यैसा न हो, कि होजाउ तुझसे दूर
फिर समझ में आये तेरे इशारो कि  भाषा
तो फिर होगा खुद पे अफसोस ज्यादा 
कि क्यों ना समझ पाये तेरे इन इशारो कि भाषा


 «« मेरी निगाहे भीड़ में न अटकी होती  »»                              «« यु न इस कदर  »»



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Thursday, May 1, 2014

11:57:00 PM

कर्मयोग

(ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण)

अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥

भावार्थ :  अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?॥1॥

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌ ॥

भावार्थ :   आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ॥2॥॥

श्रीभगवानुवाच

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन साङ्‍ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्‌ ॥

भावार्थ :  श्रीभगवान बोले- हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा (साधन की परिपक्व अवस्था अर्थात पराकाष्ठा का नाम 'निष्ठा' है।) मेरे द्वारा पहले कही गई है। उनमें से सांख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान योग से (माया से उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरतते हैं, ऐसे समझकर तथा मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाली सम्पूर्ण क्रियाओं में कर्तापन के अभिमान से रहित होकर सर्वव्यापी सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहने का नाम 'ज्ञान योग' है, इसी को 'संन्यास', 'सांख्ययोग' आदि नामों से कहा गया है।) और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से (फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदाज्ञानुसार केवल भगवदर्थ समत्व बुद्धि से कर्म करने का नाम 'निष्काम कर्मयोग' है, इसी को 'समत्वयोग', 'बुद्धियोग', 'कर्मयोग', 'तदर्थकर्म', 'मदर्थकर्म', 'मत्कर्म' आदि नामों से कहा गया है।) होती है॥3॥

न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥

भावार्थ :  मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम 'निष्कर्मता' है।) को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है॥4॥

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥

भावार्थ :  निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है॥5॥

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥

भावार्थ :  जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है॥6॥

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥

भावार्थ :  किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है॥7॥॥

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥

भावार्थ :   तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा॥8॥



«« अर्जुनविषादयोग ( अध्याय 1)  »»                              «« सांख्ययोग ( अध्याय 2 )  »»

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"जय हिन्द जय भारत''  

Thursday, April 24, 2014

1:09:00 AM

पाप के अनूठे रंग

एक बार घूमते-घूमते कालिदास बाजार गये | वहाँ एक महिला बैठी मिली | उसके पास एक मटका था और कुछ प्यालियाँ पड़ी थी | 
कालिदास ने उस महिला से पूछा : ” क्या बेच रही हो ? 

“ महिला ने जवाब दिया : ” महाराज ! मैं पाप बेचती हूँ |

 “ कालिदास ने आश्चर्यचकित होकर पूछा : ” पाप और मटके में ? 

“ महिला बोली : ” हाँ , महाराज ! मटके में पाप है  

“ कालिदास : ” कौन-सा पाप है ? 

“महिला : ” आठ पाप इस मटके में है | 
                मैं चिल्लाकर कहती हूँ की मैं पाप बेचती हूँ पाप …और लोग पैसे देकर पाप ले जाते है|”
अब महाकवि कालिदास को और आश्चर्य हुआ : ” पैसे देकर लोग पाप ले जाते है ? “महिला : ” हाँ , महाराज ! पैसे से
खरीदकर लोग पाप ले जाते है | “

कालिदास : ” इस मटके में आठ पाप कौन-कौन से है ? “

महिला : ” क्रोध ,बुद्धिनाश , यश का नाश , स्त्री एवं बच्चों के साथ अत्याचार और अन्याय , चोरी , असत्य आदि दुराचार , पुण्य का नाश , और स्वास्थ्य का नाश … ऐसे आठ प्रकार के पाप इस घड़े में है | “

कालिदास को कौतुहल हुआ की यह तो बड़ी विचित्र बात है | किसी भी शास्त्र में नहीं आया है की मटके में आठ प्रकार के पाप
होते है | 

वे बोले : ” आखिरकार इसमें क्या है ? 

” महिला : ”महाराज ! इसमें शराब है शराब ! “
कालिदास महिला की कुशलता पर प्रसन्न होकर बोले : ” तुझे धन्यवाद है ! शराब में आठ प्रकार के पाप है यह तू जानती है
और ‘मैं पाप बेचती हूँ ‘ ऐसा कहकर बेचती है फिर भी लोग ले जाते है |


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Thursday, April 17, 2014

1:25:00 AM

जरा गौर से पढ़े

यह एक ऐसा वाकया है , जिसे सुन कर
इंसान की रूह काँप जाती है ।
मगर जालिमों के हाथ ना काँपें ।
दिनांक : 17 अप्रैल 2014

उत्तर प्रदेश में ४ साल का मासूम

अभी सही तरह बोल
नहीं सकता था ........
वह हाथ जोड़ता रहा ,

उसकी
चीखों से आसमान झुक  गया,
मगर
उसके सगे बाप और भाई ने उसकी एक
ना सुनी
और,उसे जबर्दस्ती.........
!
!
!
!
!
टकला कर दिया .......
गर्मी जो थी .........
गौर से पढ़ने के लिये शुक्रिया!

Sunday, April 13, 2014

7:56:00 AM

ए मेरे वतन के लोगो


              

Lyrics पढ़ने के लिए यहाँ click करे -> ए मेरे वतन के लोगो 

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Friday, April 11, 2014

8:56:00 AM

सांख्ययोग

( स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा )
अर्जुन उवाच

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌ ॥

भावार्थ :  अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?॥54॥

श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌ ।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥

भावार्थ :   श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है॥55॥

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥

भावार्थ :  दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है॥56॥

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌ ।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

भावार्थ :  जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है॥57॥

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

भावार्थ :  और कछुवा सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिए)॥58॥

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते ॥

भावार्थ :  इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है॥59॥

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥

भावार्थ :  हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं॥60॥

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

भावार्थ :   इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है॥61॥

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥

भावार्थ :   विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है॥62॥

क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥

भावार्थ :   क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है॥63॥

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌ ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥

भावार्थ :   परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है॥64॥

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥

भावार्थ :   अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है॥65॥

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌ ॥

भावार्थ :   न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?॥66॥

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥

भावार्थ :   क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है॥67॥

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

भावार्थ :   इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है॥68॥

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥

भावार्थ :   सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है॥69॥

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌ ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥

भावार्थ : जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं॥70॥

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥

भावार्थ : जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है॥71॥

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥

भावार्थ : हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है॥72॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥2॥


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